वाराणसी। सावन के अंतिम सोमवार को बीएचयू विश्वनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालु उमड़े। भक्तों ने विधिविधान से बाबा का जलाभिषेक व दर्शन-पूजन कर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगा। इस दौरान मंदिर परिसर हर-हर महादेव के उद्घोष से गुंजायमान रहा। बीएचयू में सफेद संगमरर से बना मंदिर कुतुब मीनार से भी ऊंचा है इस मंदिर में वैसे तो साल भर तक दर्शन पूजन का क्रम चलता रहता है, दूर-दूर से लोग बाबा के दर्शन करने पहुंचते हैं। सावन में श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। सावन के आखिरी सोमवार को बाबा के दर्शन के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़े। इस बार 2 माह के सावन में 8 सोमवार पड़े थे। ऐसी मान्यता है कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय में नर्मदेश्वर बाणलिंग के रूप में स्थापित बाबा काशी विश्वनाथ भक्तों को अभय, ज्ञान और मुक्ति प्रदान करते हैं। कम लोग ही जानते होंगे कि देश का सबसे ऊंचा मंदिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय में है। यह मंदिर दिल्ली के ऐतिहासिक कुतुब मीनार से भी 13 फीट ऊंचा है। कुतुब मीनार की ऊंचाई 239 फीट है। भारत की समस्त वास्तुशैलियों द्रविण, नागर और बेसर को समेटे हुए काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना के पीछे महामना मदन मोहल मालवीय जी की सोच थी। शिक्षा का एक ऐसा मंदिर हो जहां पढ़ने वाले सुबह उठकर गंगा स्नान करें और फिर यहीं परिसर में बाबा विश्वनाथ का दर्शन-पूजन भी करें। इसी सोच के साथ उन्होंने गंगा किनारे विश्वविद्यालय निर्माण की 1916 में आधारशिला रखी। उसी साल बाढ़ आई और स्थापना स्थल तक गंगा का जल पहुंच गया। मालवीय जी ने यह कह कर जमीन को छोड़ दिया कि यह गंगा मैया की जमीन है बीएचयू के प्रोफेसर विनय कुमार पांडे का कहना है कि बीएचयू के निर्माण के दौरान ही महामना ने भव्य विश्वनाथ मंदिर के निर्माण के बारे में सोचा था। वह मंदिर की आधारशिला किसी तपस्वी से रखवाना चाहते थे। उन्हें स्वामी कृष्णम नामक तपस्वी की जानकारी मिली। स्वामी कृष्णम उस वक्त गंगोत्री ग्लेशियर से 150 कोस दूर कांड गुफा में तप कर रहे थे। मालवीय जी ने 1927 में गोस्वामी गणेशदास के हाथों विश्वविद्यालय परिसर में विश्वनाथ मंदिर के शिलान्यास के लिए न्योता भेजा। तपस्वी कृष्णम को मनाने में गणेशदास को चार साल लग गए। 11 मार्च 1931 को स्वामी कृष्णम के हाथों मंदिर का शिलान्यास हुआ। इसके बाद मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ। दुर्भाग्य से मंदिर का निर्माण मालवीय जी के जीवन काल में पूरा ना हो सका। भव्य मंदिर के निर्माण के लिए उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने मालवीय जी से वादा किया था और उसको पूरा किया। 1954 तक शिखर को छोड़कर मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हो गया। 17 फरवरी 1958 को महाशिवरात्रि के दिन मंदिर के गर्भगृह में नर्मदेश्वर बाणलिंग की प्राण प्रतिष्ठा के साथ भगवान विश्वनाथ की स्थापना मंदिर में हो गई। मंदिर के शिखर पर सफेद संगमरमर लगाया गया और उनके ऊपर एक स्वर्ण कलश स्थापित है। इस स्वर्णकलश की ऊंचाई 10 फीट है। भारत कला भवन में मंदिर का ब्लू प्रिंट सुरक्षित है।