तालाबों में कूड़ा कर्कट डालना शौच करना व अतिक्रमण आखिर कब बंद होगा
बांदा। कहा जाता है कि पहले के काल खंड में लोगों को पानी के लिए दर बदर भटकना पड़ता था पानी लाने के लिए महिलाएं पांच छः किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाती थी जिसके बाद भोजन बनता था पूर्वजों ने विशेष कर जिनके कोई संतान नहीं होती थी अपना सर्वस्व लगाकर तालाब और कुएं का निर्माण कराया इस उम्मीद के साथ कि कोई पानी के लिए परेशान ना हों बाद में यही तालाब और कुंआ कृषि का भी मुख्य आधार बन गये। आज की तारीख में हमारा देश विकसित भारत बनने जा रहा है किन्तु कुछ लोगों की सोच आज तक नहीं बदली है स्वच्छता के प्रति उनका नजरिया आज भी वैसा ही है जैसा कल तक था कभी तालाब को गन्दा करने पर पंचायत दंड दिया करती थी वह आंख बंद करके उन्हें प्रोत्साहित करती नजर आ रही है।
धीरे – धीरे तालाबों का अस्तित्व मिटता चला जा रहा है तालाब कूड़ा कर्कट, शौच करने व अतिक्रमण कर मकान बनाने के काम आ रहें है जब कभी सरकार या न्यायालय तालाबों के संरक्षण की बात करती हैं तो एक बार लगता है कि तालाबों के भी दिन बदलने वाले हैं पर पता नहीं क्यों यह कागजों तक ही सीमित रहता है।हम लोग चाहकर भी तालाबों को नहीं बचा सकते चाहे कितना भी सफाई अभियान चलायें लोगों को जागरूक करें क्योंकि कुछ लोगों की धारणा ही तालाबों के अस्तित्व को मिटाने की है जिला प्रशासन जब खुद साथ में आयेगा और जिम्मेदारी के साथ संरक्षण करेगा तभी संभव हो सकता है कि तालाबों का अस्तित्व बचें।