– उपनिदेशक ने सरकारी परिसर को ही अपना आवास बनाया
– उपनिदेशक कार्यालय में एक कर्मचारी 15 वर्षों कुंडली मारे बैठा है
– एक मामूली सफाई कर्मचारी के हवाले सभी महत्वपूर्ण कार्य
बांदा
मंडलीय पंचायत राज विभाग भ्रष्टाचार की ऐसी दलदल में डूब चुका है, जहां उप निदेशक जैसे अधिकारी न केवल नियम-कानूनों को रौंद रहे हैं, बल्कि अपने चहेतों के साथ मिलकर सरकारी संसाधनों की लूट का संगठित गिरोह चला रहे हैं। यह विभाग अब ग्रामीण विकास का मंदिर नहीं, बल्कि शोषण, उगाही और भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। इस काले साम्राज्य का एक जीता-जागता उदाहरण है! एक सफाई कर्मचारी जो महोबा में नियुक्त होने के बावजूद पिछले 16 वर्षों से चित्रकूट धाम मंडल के उप निदेशक पंचायत कार्यालय में अंगद की तरह पैर जमाए बैठा है। एक मामूली सफाई कर्मचारी को कार्य सामग्री, प्रशिक्षण टेंडर की पत्रावलियां तैयार करने, जेम पोर्टल पर L-1 पर हस्ताक्षर करने, फाइल और बिल अपलोड करने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों का अधिकार सौंपा गया है। यह सब तब हो रहा है, जब शासन ने स्पष्ट आदेश दिए हैं कि सफाई कर्मचारियों को किसी कार्यालय से संबद्ध नहीं किया जाएगा। पूर्व निदेशक मंसूर अली सरवर के चार कर्मियों को संबद्ध करने के आदेश को शासन ने निरस्त कर दिया था, फिर भी सफाईकर्मी बेशर्मी से डटा हुआ है।
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, अन्य स्रोतों से जो रकम उगाही की जाती है वह रकम उपनिदेशक के बेटे के खाते में जमा की जाती है, जिसके प्रमाण जमा पर्चियों में साफ दिखते हैं। धमकियों और शोषण के दम पर चल रहा यह भ्रष्ट तंत्र विभागीय चुप्पी से और मजबूत हो रहा है, जो इस काले साम्राज्य की गहराई को उजागर करता है।
एक अन्य घृणित प्रकरण में स्वयं उपनिदेशक परवेज आलम खान सितंबर 2024 से पंचायत उद्योग, बांदा के सरकारी परिसर को निजी आवास बनाकर उपयोग कर रहे हैं। इसके बावजूद, 15 सितंबर 2023 को कार्यभार ग्रहण करने के बाद से वे हर महीने मकान किराया भत्ता (HRA) अपनी जेब में डाल रहे हैं। शासनादेश स्पष्ट है कि सरकारी आवास का लाभ लेने वाला कोई भी अधिकारी HRA का हकदार नहीं, फिर भी परवेज नियमों को ठेंगा दिखाकर भ्रष्टाचार की मिसाल कायम कर रहे हैं। परियोजना निदेशक, जिला ग्राम विकास अभिकरण, बांदा, प्रवीणा नंद ने 17 जून 2025 को निदेशक, पंचायती राज, उत्तर प्रदेश को लिखे पत्र में इस घोटाले की परतें उधेड़ी हैं। सवाल उठता है—क्या पंचायत उद्योग सरकारी परिसर है? क्या इसका अवैध उपयोग कर HRA लिया जा सकता है?
इतना ही नहीं, पंचायत भवन में पहले लाखों रुपये का लोहा और अन्य सामग्री मौजूद थी, जो उपनिदेशक के कब्जे के बाद बेच दी गई। क्या इसकी नीलामी के लिए जिलाधिकारी या मुख्य विकास अधिकारी से अनुमति ली गई थी ? पंचायत उद्योग में रहते हुए हजारों रुपये का बिजली बिल भुगतान कौन कर रहा है—पंचायत उद्योग व्यवस्थापक या उपनिदेशक? यह घिनौना खेल कब तक चलेगा?
जब तक विभाग के मुखियां जैसे भ्रष्ट अधिकारी और उनके चेले बेखौफ लूट मचाते रहेंगे, ग्रामीण विकास का सपना चूर-चूर होता रहेगा। प्रशासन को तत्काल कठोर कार्रवाई कर इस भ्रष्ट तंत्र को जड़ से उखाड़ना होगा। अन्यथा, यह भ्रष्टाचार की महामारी पूरे सिस्टम को खोखला कर देगी। जनता की मेहनत की कमाई पर डाका डालने वाले इन लुटेरों को बेनकाब कर कड़ी सजा दी जाए—यह समय की मांग है, यह जनता की पुकार है!